बिहार में बीजेपी- जेडीयू के बीच सीट बंटवारे को लेकर तनातनी, छवि बचाने की कोशिश

 बिहार में जदयू-बीजेपी के बीच राजनीतिक छवि बचाने की जद्दोजहद

नीतीश कुमार घर वापसी की राह पर हैं. करीब एक साल पहले महागठबंधन छोड़ बीजेपी का उन्होंने फिर से दामन पकड़ा था. इससे पहले तक वे लालू प्रसाद यादव के राजद और कांग्रेस के साथ थे. प्रशासन में राजद नेताओं के हस्तक्षेप से परेशान होकर उन्होंने सुशासन के दावे के साथ भाजपा की अंगुली पकड़ी थी, लेकिन लगता है यह साथ अब फिर से छूटने वाला है. नीतीश ने अब तक इस पर कुछ स्पष्ट नहीं कहा है लेकिन पिछले 10-15 दिनों में उनके साथ-साथ उनकी पार्टी के नेताओं के सुर भी बदल गए हैं.

पिछले साल बीजेपी के साथ गठबंधन कर दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने 2019 के आम चुनावों के बारे में पूछे जाने पर कहा था कि मोदीजी से मुकाबला करने की क्षमता किसी में नहीं है. लेकिन एक साल बाद ही वे सार्वजनिक मंचों से नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना करने लगे हैं. और तो और, पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने तो बीजेपी को स्पष्ट कह दिया कि 2019 के आम चुनावों में जदयू राज्य में सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. बीजेपी को यह मंजूर नहीं हो तो वह अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय कर सकती है.

दरअसल, बीजेपी और जदयू के बीच तनातनी की मुख्य वजह सीटों का बंटवारा तो है ही, कई और मुद्दे हैं जो विवाद का कारण बने हुए हैं. जदयू ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजद के साथ गठबंधन तोड़ा था, लेकिन इसके बाद कई भाजपा नेताओं और मंत्रियों के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं. जदयू चाहकर भी इसके विरुद्ध आवाज नहीं उठा पा रहा है. एक मुद्दा नीतीश कुमार की राजनीतिक विश्वसनीयता का भी है. बार-बार गठबंधन के साझीदार बदलने से यह धारणा बनने लगी है कि नीतीश अवसरवादी और समझौतावादी हैं. वे सिद्धांतों का हवाला भले दें, लेकिन वे अपने राजनीतिक फैसले नफा-नुकसान के तराजू पर ही तौल कर लेते हैं. इन सबसे अलग एक सवाल नीतीश की राजनीतिक हैसियत का भी है.

इन सबके बीच बड़ा सवाल यह है कि क्या 2019 के चुनाव आते-आते राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल दल एक रह पाएंगे. छह महीने पहले तक गठबंधन के भविष्य को लेकर कोई संदेह नहीं था, लेकिन उत्तर प्रदेश के उपचुनाव और फिर कर्नाटक विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार के बाद गठबंधन के साझीदार दल उस पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. तेलुगू देशम पार्टी पहले ही गठबंधन से बाहर हो चुकी है, जम्मू कश्मीर में पीडीपी से बीजेपी खुद ही अलग हो गई है और महाराष्ट्र में शिवसेना 2019 का चुनाव अकेले लड़ने का कई बार संकेत दे चुकी है. बिहार में ही लोकजनशक्ति पार्टी और रालोसपा भी अपनी बाहें फड़काने लगे हैं. तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक को छोड़ किसी दूसरी पार्टी के राजग में शामिल होने की फिलहाल कोशिश नहीं दिखती. ऐसे में यदि नीतीश राजग के पाले से बाहर निकलते हैं तो जदयू से ज्यादा मुश्किलें बीजेपी को होंगी. बीजेपी और राजग के लिए चुनौती अपनी वजूद और हैसियत बचाने की होगी तो नीतीश के लिए अपनी पालाबदल छवि से बाहर निकलने की होगी.

loading...