ओड़िसा: इस भक्त ने करवाया भगवान से चमत्कार, अपने आप रुक जाया करती थी यात्रा

 जगन्नाथ की रथ यात्रा रुक जाती थी इस भक्त के लिए, जानिए पूरी कहानी

प्रभु जगन्नाथ को श्रधालुयों का भगवान कहा जाता है. जब-जब भक्तों ने भक्ति से पुकारा भगवान उस के साथ खड़े हुए दिखाई दिए. यह माना जाता है जब तक प्रभु जगन्नाथ का डोरी नहीं लगता तब तक प्रभु के दर्शन नहीं हो पाते हैं. कई ऐसी कहानियां है जब प्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों के उम्मीद पर खरे उतरे हैं. कभी प्रभु अपने भक्तों के लिए साक्षी देने के लिए निकल पड़ते हैं तो कभी दासिया नामक एक दलित के हाथ से नारियल उठा लेते हैं. महाप्रभु जगन्नाथ के सामने न कोई जाती होती है न कोई धर्म. जो भी प्रभु जगन्नाथ को पूरी श्रद्धा से पुकारता है भगवान उस की भक्ति पर खरे उतरते हैं.

ऐसी ही एक कथा भक्त सालबेग की है जो धर्म से तो मुसलमान था, लेकिन प्रभु जगन्नाथ का सबसे बड़ा श्रद्धालु बन गया था. भक्त सालबेग के पिता मुस्लिम और माता ब्राह्मण थी. सालबेग के पिता मुगल आर्मी में सैनिक थे. अपने पिता की तरह सालबेग ने भी मुगल आर्मी में काम किया. एक बार युद्ध के दौरान सालबेग पूरी तरह ज़ख़्मी हो गए. जब सभी को लगा था कि सालबेग स्वस्थ नहीं हो पाएंगे तब सालबेग की मां ने प्रभु जगन्नाथ के शरण में जाने के लिए कहा.

जगन्नाथ के आर्शीवाद से सालबेग पूरी तरह ठीक हो गए और प्रभु जगन्नाथ का बहुत बड़ा श्रद्धालु बन गए. सालबेग जगन्नाथ ने भक्ति में कई सारे भक्ति कवितायें भी लिखी. एक बार सालबेग भगवान जगन्नाथ से मिलने के लिए पुरी गए, लेकिन वह मुसलमान होने के कारण से उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया. फिर हर वर्ष सालबेग रथ यात्रा के दौरान पूरी जाते थे और प्रभु जगन्नाथ के दर्शन करते थे.

एक बार रथयात्रा के समय सालबेग पुरी से बाहर थे. उन्हें लगा की समय पर रथ यात्रा देखने के लिए पुरी पहुंच नहीं पाएंगे. फिर सालबेग ने भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना की, कि उनके पहुंचने तक वह इंतजार करें. फिर क्या हुआ भगवान जगन्नाथ ने अपने भक्त की बात मान ली. रथ जहां खड़ा था वहीं रूक गया आगे की तरफ नहीं गया. लाखों भक्त परमेश्वर के रथ को आगे ले जाने के लिए प्रयास कर रहे थे. भक्तों की कई कोशिशों के बावजूद रथ आगे नहीं गया.

बाद में सालबेग पुरी पहुंचे और भगवान के दर्शन कर लिए, जिसके बाद रथ आगे जाने लगा. इसके बाद भक्त सालबेग की भक्ति के बारे में सभी को पता चला. फिर सालबेग पूरी में रहने लगे. उनके देहांत के बाद उनकी समाधि पुरी के उस जगह पर बनाई गई जहां वह रहते थे. इस समाधि के रास्ते में भगवान जगन्नाथ रथ हर साल जाता है और जब रथ इस स्थान पर पहुंचता है तो कुछ समय के लिए रूक जाता है.

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