भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इस कथा का जरूर करें पाठ: देवउठनी एकादशी

 देवउठनी एकादशी: करें इस कथा का पाठ, होंगे भगवान विष्णु प्रसन्न

देवउठनी एकादशी के दिन पूरे दिन उपवास के बाद शाम को भोजन करने से सात जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है. देव उठनी एकादशी जिसे प्रबोधनी एकादशी भी कहा जाता है. इसे पापमुक्त करने वाली एकादशी भी माना जाता है. मान्यता है कि जितना पुण्य राजसूय यज्ञ करने से होता है उससे अधिक देवउठनी एकादशी के दिन होता है. इस दिन से चार माह पूर्व देवशयनी एकादशी मनाई जाती है. इसके लिए माना जाता है कि भगवान विष्णु समेत सभी देवता क्षीर सागर में जाकर सो जाते हैं. इसलिए इन दिनों पूजा-पाठ और दान-पुण्य के कार्य किए जाते हैं. किसी तरह का शुभ कार्य जैसे शादी, मुंडन, नामकरण संस्कार आदि नहीं किए जाते हैं.

क्या है कथा का महत्व: एक बार नारद मुनि ने ब्रह्मा जी से पूछा कि प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का क्या महत्व है? तब ब्रह्मा जी ने कहा कि कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी के व्रत का फल सौ राजसूय यज्ञ के फल के समान होता है. पूरे दिन उपवास के बाद संध्या को खाना खाने से सात जन्मों के पापों से छुटकारा मिलता है. पूरे त्रिलोक में जिस वस्तु का मिलना असंभव है वो प्रबोधिनी एकादशी के व्रत करने से सरलता से प्राप्त हो जाती है. पूर्व जन्म के किए हुए सभी कुकर्मों को प्रबोधिनी एकादशी का व्रत क्षण-भर में समाप्त कर देता है. इसके बाद वो उन्हें व्रत कथा सुनाते हैं.

क्या है कथा : भगवान विष्णु की नींद अनियमित थी. कई बार वो महीनों तक जागते रहते थे और कई बार महीनों तक लगातार नींद में रहते थे. उनकी इस बात से माता लक्ष्मी उनसे नाराज रहती थी. उनके साथ बाकि देवताओं और संयासियों को उनके लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती थी. उनकी इस आदत का लाभ राक्षस लेते थे और मनुष्यों को परेशान करते थे. इससे धरती पर अधर्म फैलता जा रहा था. एक दिन जब अपनी नींद से भगवान विष्णु नींद से जागे तो उन्होंने देखा कि सभी देव और साधु संत उनसे सहायता मांग रहे हैं. उन्होनें अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि शंख्यायण नाम का राक्षस ने सभी वेदों को चुरा लिया है और जिससे सभी लोग ज्ञान से वंचित हो गए हैं. इसके बाद भगवान विष्णु ने सभी से वेदों को वापस लाने का वादा किया. इसके लिए उन्होनें शंख्यायण राक्षस से युद्ध किया. उसके साथ कई दिन तक युद्ध करने के बाद जब वो वापस आए तो उन्होनें चार महीने तक विश्राम करने का प्रण ले लिया.

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